निठल्ला चिंतन – परजीवी

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लेखक – धैर्यशील येवले

चिंतामणि बहुत दिन हो गए अपने परिचितों से मिले, चलो आज चल कर उनका हालचाल जानते है , मैंने चिंतामणि से कहा,
वो तो जैसे तैयार ही बैठा था, बोला हा भैया जी चलते है ,आज सभी से मिलेंगे , मिल कर बड़ा आनंद आएगा । बातचीत करते हम गोपाल जी की दुकान पर पोहच गए ,हमे देख उन्होंने प्रसन्नता से हमारा स्वागत किया , और कहा बड़े दिनों बाद पधारें कुशलक्षेम पूछ कर हमारे लिए चाय बुलाई , चाय पीकर चिंतामणि ने गोपाल जी से पूछा , व्यापार व्यवसाय कैसा चल रहा है , गोपाल जी जैसे फटे ही बैठे थे, तुरंत बोले अरे भाई साहब अब क्या व्यापार व्यवसाय जैसे तैसे गुजारा हो रहा है , ये जी , एस , टी का चक्कर ऊपर से ये ऑनलाइन खरीदी का चलन व्यापारी तो मर ही गया है समझिए । थोड़ी देर इधर उधर की बातें कर गोपाल जी से विदा ले कर, हम अपने किसान मित्र अम्बाराम जी के घर पोहचे, वे घर के बाहर ही खटिया पर बैठे चाय पी रहे थे ,हमे देख बड़ी ही आत्मीय ता से हमारा स्वागत करते बोले, बिल्कुल सही समय पर आए भैयाजी और तुरंत हमारे लिए भी चाय बुलाई , हम दोनों ने चाय पीने से ना नुकुर की ,पर हमारी एक न चली चाय पीना ही पड़ी । दिन दुनिया की बातें कर मैंने अम्बाराम जी पूछा खेत खलिहान क्या कह रहे है ।
मेरी बात सुनते ही अम्बाराम जी उदास होकर बोले सब राम भरोसे चल रहा है , बिजली की किल्लत, खाद की किल्लत , मजदूर मिलते नही , ऊपर से बेमौसम बारिश इन सब परेशानी से उबर कर थोड़ा बहुत पक जाता है , तो मंडी में भाव नही मिलता , बहुत परेशान है , किसान तो बाबूजी ,उनका दुःख दर्द बांट कर ,उन्हें दिलासा देते हुए उनसे विदा ली । रास्ते से जाते समय अग्रवाल जी की फैक्ट्री के सामने उनकी कार खड़ी देख कर उनकी फैक्ट्री में प्रवेश किया , कोने में बने वातानुकूलित ऑफिस में वे बैठे थे , हमे देख हमारा अभिवादन कर हमें सम्मान पूर्वक ऑफिस में बिठाया , उनके ऑफिस का इंटीरियर अत्यंत सुंदर था । अपनी रिवाल्विंग चेयर पर बैठ कर उन्होंने पूछा कैसे आना हुआ , चिंतामणि बोला कुछ नही इधर से गुजर रहे थे आपकी कार खड़ी देखी तो मिलने आ गए । अग्रवाल जी बोले बहुत अच्छा किया ,क्या लेंगे ठंडा गर्म , हम दोनों एक साथ बोल उठे नही नही कुछ नही लेंगे ,अभी चाय पी है । उन्होंने दराज खोल कर चांदी की पान पेटी निकाली और कहा पान तो चलेगा ये लीजिये ,
हम दोनों ने एक एक ताम्बूल उठा कर मुँह में रख लिया , बहुत ही लजीज पान था पूरा मुँह स्वाद व महक से भर उठा , मैंने अग्रवाल जी से पूछा फैक्ट्री कैसे चल रही है , तो अग्रवाल जी गंभीरता से बोले फैक्ट्री चलाना बहुत कठिन हो गया है , ये लायसेंस वो लायसेंस ये परमिशन वो परमिशन , ऊपर से लेबर समस्या , मूलभूत सुविधाएं जो शासन से उद्योगों को मिलना चाहिए नही मिल रही है हम लोगो को उद्योग
चलाना एवरेस्ट पर चढ़ने जैसा हो गया है । खैर छोड़िए ये सब चलता रहेगा और क्या सेवा करू , मैंने उनसे कहा ताम्बूल बहुत ही लजीज था ,अब हम चलते है , उनसे नमस्कार कर वहा से विदा ली । चिंतामणि बोला यहाँ पास ही तहसील ऑफिस है , सुरेश बाबूजी से मिलते हुए चलते है , हम दोनों तहसील ऑफिस पोहचे सुरेश बाबूजी जो हमारे परिचित है अपनी टेबल पर बैठे कोई फ़ाइल खंगाल रहे थे , उनका ध्यान आकर्षित करने के लिए चिंतामणि ने उन्हें आवाज दी । उन्होंने सिर उठा कर हमें देखा और बहुत ही दयनीय मुस्कान चेहरे पर लाते हमें नमस्कार किया , मैंने उनसे कहा काफी व्यस्त लग रहे है , क्या है न भाई साहब , कल कलेक्टर साहब की मीटिंग है ,इतनी जानकारी मांगी है कि बनाते बनाते रात के तीन चार बज जाएंगे सुरेश बाबू बोले और बहुत ही अनमने ढंग से हमें बैठने को कहा , उनके हाल देख कर चलना ही मुनासिब समझ , हम दोनों ने फिर आएंगे कह कर उनसे विदा ली । मैं स्कूटर चला रहा था ,चिंतामणि पीछे बैठा था ,हम दोनों ने हेलमेट पहन रखे थे ,
चौराहे पर ट्रैफिक जवान की और विजयी मुस्कान से देखते हुए आगे बढ़े सामने ही , कटकट पूरा थाना था उसे देख चिंतामणि बोला यहाँ के थाना प्रभारी आपके परिचित है न भाईसाहब ?
मैंने हा में गर्दन हिलाई तो चिंतामणि बोला चलिए न उनसे मिलते है , मैंने कहा ठीक है चलो मिलते है ,और मैंने स्कूटर थाने में ले लिया , उतर कर थाने में प्रवेश करने लगे ,संतरी ने रोक दिया और सवालों की झड़ी लगा दी ,आप कौन हो ,क्यो आये हो ,किससे काम है आदि आदि , मैंने धीरे से उनसे कहा हम थाना प्रभारी जी के परिचित है इधर से गुजर रहे थे सोचा मिलते हुए चले इसलिए उनसे मिलने आये है । संतरी ने भीतर जाने का रास्ता दे दिया ।
थाना प्रभारी जी के कक्ष में तीन चार कुर्ते पजामे पहने गले मे अंग वस्त्र डाले स्थानीय नेता गण बैठे थे , उनके बैठने के उठाई गिरे अंदाज़ से लग रहा था की वे जबरन थाना प्रभारी पर झांकी जमाने का प्रयास कर रहे है । मुझे देख थाना प्रभारी जी ने अपनी कुर्सी से उठ कर मेरा गर्म जोशी से स्वागत करते हुए कहा आइए भाई साहब । मैंने भी उन्हें नमस्कार किया , थाना प्रभारी जी ने वहाँ बैठे घुसपैठियों से मेरा परिचय कराते हुए कहा , ये हमारे भाईसाहब है, और राजधानी में पार्टी अध्यक्ष जी का सारा काम देखते है ।
मेरा परिचय सुन वे सभी सकपका कर बगले झांकने लगे और खिसियाते हुए मुझे नमस्कार कर ,थाना प्रभारी जी से कहा फिर कभी आएंगे और चल दिये । मैंने कुर्सी पर बैठते हुए थाना प्रभारी जी से कहा आपने मेरे झूठा परिचय उन्हें क्यो दिया ,
तो थाना प्रभारी जी बोले भाईसाहब वे स्थानीय नेताजी के पिछलग्गू थे ,मुझे प्रभावित करने आये थे , अच्छा हुआ आप इस समय आ गए ,
तो मैंने उन्हें आपका परिचय देते उन पर अपनी झांकी जमा दी , अब नही आएंगे वे मुझे परेशान करने । मैंने थाना प्रभारी जी से कहा और कैसा चल रहा है ? तो वे बोले क्या बताए भाईसाहब , काम के बोझ के नीचे दबे जा रहे है ,शारीरिक और मानसिक दोनों तनाव इतने है , कि मन करता है नोकरी छोड़ दे । परंतु अब मझधार में दूसरा और क्या कर पाएंगे सोच कर नोकरी चल रही है । थाना प्रभारी के चेहरे पर पीड़ा के भाव तैर रहे थे । थोड़ी देर उनसे गपशप कर विदा ली । चिंतामणि और मैं घर तरफ जा रहे थे , रास्ते मे नेताजी की कोठी देख कर
चिंतामणि ने मुझ से कहा भाई साहब नेताजी से भी मिल लेते है , मेलजोल रखना जरूरी है जाने कब जरूरत पड़ जाए । मैंने कहा ठीक है , और स्कूटर नेताजी की कोठी के सामने रोक कर भीतर प्रवेश किये , नेताजी की कोठी और उनका वैभव देखते ही बनता है, नेताजी अपने दीवान पर मसनद के सहारे अधलेटे बैठे थे , आस पास की प्लास्टिक की कुर्सियों पर दस बीस लोग बैठे थे , कुछ याचक की मुद्रा में तो कुछ चेहरे पर चापलूसी का भाव लिए थे , मैंने व चिंतामणि ने उन्हें प्रणाम किया , उन्होंने अभिवादन का कोई जवाब न देते सीधे सपाट शब्दो मे पूछा कैसे आना हुआ , क्या काम है । मैंने कहा कोई काम नही है ,इधर से निकल रहे थे तो सोचा आपसे मिलते हुए निकले इसीलिए आए है । नेताजी ने कहा अच्छा अच्छा और अपने नोकर से बोले अरे गबरू इन्हें पानी वाणी पिला दे ,तथा पास बैठे याचक की और मुखातिब हो गए ।
मैं और चिंतामणि गेट की और बढ़ रहे थे कि नेताजी के जोरदार ठहाके की आवाज कानो में पड़ी ,
चिंतामणि मुझ से पूछ रहा था भाई साहब नेताजी की कोई खेती बाड़ी नही,व्यापार नही , उद्योग नही , नोकरी नही किसी बात का कोई तनाव नही इसीलिए प्रसन्न हो कर ठहाके लगा रहे है , है न??
मैंने चिंतामणि की और देखा और कहा तुम सही कह रहे हो चिंतामणि ।
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